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देश में स्वतंत्रता आन्दोलन चरम पर था।महात्मा गॉधी ने 9अगस्त 1942को अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया।इस नारे के साथ पूरे देश में दूरस्थ क्षेत्र तक असहयोग आन्दोलन तेजी से फैल गया। इससे अल्मोड़ा के सुदूरवर्ती चौकोट पट्टी भी अछूती नहीं रही।संसाधनों के अभाव के बाबजूद भी यहां देशभक्ति का जो जजबा रहा वह इतिहास के पन्नों दर्ज है।19अगस्त 1942 को चौकोट के देघाट में आन्दोलनकारियों की सभा में में अंग्रेजी हुकूमत ने गोली चला दी।तथा हरिकृष्ण उप्रेती तथा हीरामणी बड़ौला शहीद हो गये।
अल्मोड़ा जनपद के वर्तमान विकास खण्ड स्याल्दे अंतर्गत चौकोट क्षेत्र की तीन पट्टियों में स्वतंत्रता आन्दोलन को महात्मा गॉंधी की 1930में टांडी यात्रा में शामिल रहे क्षेत्र के ज्योतिराम काण्डपाल व भैरबदत्त जोशी ने नयी धार देने का काम किया।इसी क्रम में अंग्रेजों भारत छोड़ों आन्दोलन के तहत उदयपुर गांव में खुशाल सिंह मनराल के नेतृत्व में एक सभा आयोजित की गई। सभा की अध्यक्षता प्रसिद्ध क्रांतिकारी दामोदर स्वरूप ने की। बैठक में तय हुआ कि 19 अगस्त1942 को देघाट में विनोद नदीतट पर विशाल सभा होगी।18 अगस्त 1942 से ही कुमाऊं तथा सीमावर्ती गढ़वल के चौथान पट्टी क्षेत्र के सैकड़ों आंदोलनकारियों का देघाट में जमावड़ा लग गया। 19 अगस्त 1942 की सभा की भनक लगते ही रानीखेत क्षेत्र के परगना मजिस्ट्रेट जानसन घोड़े में सवार होकर लाव-लश्कर और ब्रिटिश पुलिस बल के साथ सभा स्थल पहुंचे।यहां प्रमुख आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किए जाने की सूचना मिलते ही लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। बड़ी संख्या में जुटे लोगों ने पटवारी चौकी को चारों ओर से घेर लिया।इस दौरान अंग्रेजी हुकूमत द्वारा की गयी गोलीबारी में देघाट खल्डुवा निवासी हीरामणि बड़ौला तथा भेलीपार निवासी हरिकृष्ण उप्रेती शहीद हो गए।दोनों आंदोलनकारियों की शहादत के बाद देघाट का आंदोलनकारी माहौल गमगीन हो गया।स्वतंत्रता के बाद प्रत्येक वर्ष देघाट में 19अगस्त को शहीद दिवस मनाया जाता है।

