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खाली होते गांव, बढ़ता अकेलापन: उत्तराखंड के बुजुर्गों की अनकही कहानी


Sangam Today News/- 
उत्तराखंड की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता, देवभूमि की आस्था और हिमालय की ऊंची चोटियों से नहीं है, बल्कि उन बुजुर्गों से भी है जिन्होंने अपने जीवन का हर पल इस प्रदेश के निर्माण और संरक्षण में लगाया। आज वही बुजुर्ग पहाड़ के सुनसान होते गांवों में अकेलेपन, उपेक्षा और असुरक्षा के बीच जीवन बिताने को मजबूर हैं।
एक समय था जब पहाड़ के घरों में तीन-तीन पीढ़ियां एक साथ रहती थीं। बुजुर्ग परिवार के मुखिया होते थे, जिनके अनुभव और सलाह को सबसे अधिक महत्व दिया जाता था। लेकिन बदलते समय के साथ रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में युवा शहरों की ओर पलायन कर गए। परिणामस्वरूप हजारों गांवों में केवल बुजुर्ग ही रह गए हैं।
आज उत्तराखंड के कई गांवों में ऐसे बुजुर्ग मिल जाएंगे जो अपने बेटों और बेटियों की राह देखते-देखते वर्षों गुजार देते हैं। त्योहारों की रौनक, आंगन में बच्चों की किलकारियां और परिवार की चहल-पहल अब केवल उनकी यादों में बची हैं। मोबाइल फोन पर होने वाली कुछ मिनटों की बातचीत ही उनके लिए अपनों का सहारा बन गई है।
सबसे दुखद स्थिति तब होती है जब बीमारी या किसी आपातकाल में उन्हें तुरंत सहायता नहीं मिल पाती। कई बुजुर्ग ऐसे हैं जो अपने खेतों, पशुओं और घरों की देखभाल अकेले करते हैं। उम्र के इस पड़ाव में जहां उन्हें सहारे और सम्मान की जरूरत होती है, वहां वे संघर्ष और चिंता के बीच जीवन जी रहे हैं।
फिर भी इन बुजुर्गों का हौसला पहाड़ की तरह अडिग है। वे अपने गांव, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं को जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं। लोकगीत, लोककथाएं, रीति-रिवाज और पहाड़ी जीवन की अमूल्य विरासत आज भी उन्हीं के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुंच रही है।
समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है कि इन बुजुर्गों के जीवन को सुरक्षित, सम्मानजनक और खुशहाल बनाने के लिए ठोस कदम उठाएं। केवल पेंशन या योजनाएं ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उन्हें अपनापन, सम्मान और साथ की भी आवश्यकता है।
उत्तराखंड के बुजुर्ग केवल हमारे परिवारों के सदस्य नहीं हैं, बल्कि हमारी संस्कृति और पहचान के जीवंत प्रतीक हैं। यदि हम उनकी चिंता नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से दूर होती चली जाएंगी। समय की मांग है कि हम अपने बुजुर्गों का हाथ थामें, उनकी बातें सुनें और उन्हें यह एहसास दिलाएं कि वे आज भी हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
क्योंकि पहाड़ तभी तक जीवित हैं, जब तक उनके बुजुर्गों की आंखों में उम्मीद और दिलों में अपनापन बाकी है।