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उत्तराखंड की लोकसंस्कृति के समर्पित साधक सुप्रसिद्ध लोकगायक 67वर्षीय दीवान कनवाल का निधन हो गया है।उनके निधन पर अल्मोड़ा सहित समूचे उत्तराखण्ड में शोक की लहर दौड़ गई है। दीवान कनवाल अपनी मधुर आवाज और लोकधुनों के लिए ख्याति प्राप्त थे। अल्मोड़ा जनपद मुख्यालय से लगे खत्याड़ी गांव निवासी दीवान कनवाल ने बचपन से ही लोकसंस्कृति के संरक्षण के लिए कार्य किया। रामलीला मंच से अभिनय और गायन की शुरुआत कर आंचलिक गायन के विशिष्ट पहचान बनाई।उनकी प्रारंभिक शिक्षा प्राइमरी पाठशाला खत्याड़ी में हुई। जबकि इंटर तक की पढ़ाई रैमजे इंटर कॉलेज अल्मोड़ा व कुमाऊं विश्वविद्यालय परिसर अल्मोड़ा से बीकॉम और एमकॉम तथा राजकीय पॉलीटेक्निक द्वाराहाट से कॉमर्शियल डिप्लोमा प्राप्त किया। वर्ष 1980 में आकाशवाणी नजीमाबाद से पहली बार लोकगीत गाने का अवसर मिला, जहां उन्हें ‘बी ग्रेड’ गायक का दर्जा प्राप्त हुआ।रोजगार की तलाश में वर्ष 1984 में दिल्ली गए और वहां विभिन्न संस्थानों में कार्य करते हुए पर्वतीय कला केंद्र से जुड़कर गीत-नाट्य और रंगमंच की बारीकियां सीखीं। प्रसिद्ध संगीतज्ञ मोहन उप्रेती, बृजमोहन शाह और अन्य गुरुओं के सान्निध्य में उन्होंने गायन और अभिनय को निखारा।कुमाऊंनी फीचर फिल्म ‘मेघा आ’ में गाए गीतों से उन्हें व्यापक पहचान मिली। इसके बाद कई क्षेत्रीय फिल्मों और एल्बमों में उन्होंने अपनी आवाज दी। ‘ठाट-बाट’, ‘हुड़की धमा-धम’ और ‘सुवा’, आज कूछै, जैसे गीतों ने उन्हें लोकगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय बना दिया।वर्ष 1990 के बाद उन्होंने अल्मोड़ा में रहकर सांस्कृतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाया। ‘हिमालय लोक कला केंद्र’ की स्थापना कर उन्होंने लोकगीत, नृत्य और नाट्य मंचन के माध्यम से पहाड़ की संस्कृति को नई पहचान दिलाई।
उन्होंने अल्मोड़ा जिला सहकारी बैंक में करीब 25 वर्षों तक भिकियासैण, ताड़ीखेत,रानीखेत ,अल्मोड़ा सहित विभिन्न शाखाओं में सेवाएं देने के बाद वर्ष 2021 में वरिष्ठ शाखा प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए।दीवान कनवाल ने अपने जीवन में लगभग तीन सौ से अधिक लोकगीत आकाशवाणी और विभिन्न मंचों पर गाए। “दाज्यू हमार घरवाई रिषे ग्ये”, “आज कुछे मैत जा” और “ह्यू भरी दाना” जैसे उनके गीत आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं।लोकसंस्कृति के संरक्षण में योगदान के लिए उन्हें मोहन उप्रेती सम्मान, युवा फिल्म अवार्ड और गोपाल बाबू गोस्वामी लिजेंड अवार्ड सहित कई सम्मानों से नवाजा गया।
दीवान कनवाल हमेशा कहा करते थे कि “कला के क्षेत्र में व्यक्ति नहीं, उसकी कला जीवित रहती है।” उनका मानना था कि लोकगीतों को अपनी जमीन और बोली-भाषा से जुड़े रहना चाहिए, तभी संस्कृति का संरक्षण संभव है।
उनके निधन से उत्तराखंड की लोकसंस्कृति जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। उनके गीत और सांस्कृतिक योगदान लंबे समय तक लोगों को प्रेरित करते रहेंगे।उनके निधन पर प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं,लोककलाकारों, रंगकर्मियों, सामाजिक संगठनों ने गहरा शोक जताते हुए लोककला क्षेत्र के लिए अपूर्णीय क्षति बताया है।

